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पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
पर्यावरण- पर्यावरण शब्द 'परि' तथा 'आवरण' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है चारों ओर आवृत्त अर्थात् जीवधारियों व वनस्पतियों के चारों ओर जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार "पर्यावरण किसी जीव के चारों ओर घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं तथा उनके साथ अंतः क्रिया को सम्मिलित करता है।"
पारिस्थितिकी (Ecology) के अंतर्गत समस्त जीवों तथा भौतिक पर्यावरण के मध्य अंतर संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
पारिस्थितिकी Ecology शब्द का सबसे पहले प्रयोग 'Oekologie' के रूप में प्राणी विज्ञान शास्त्री अर्नेस्ट हेकल द्वारा 1869 में किया गया था ।
पारिस्थितिकी (Ecology) शब्द दो ग्रीक शब्दों- 'Oikas'- घर तथा 'Logos' अर्थात अध्ययन से मिलकर बना है
'पारिस्थितिकी' के जनक अर्नेस्ट हैकल के अनुसार 'वातावरण और जीव समुदाय के पारस्परिक संबंधों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहा जाता है।'
पारिस्थितिकी विज्ञान की दो प्रमुख शाखाएं हैं-
1. स्वपारिस्थितिकी(Autecology)
2. सामुदायिक पारिस्थितिकी(Synecology)
1. स्वपारिस्थितिकी(Autecology)-इसके अंतर्गत व्यक्तिगत पौधे तथा जंतु अथवा व्यक्तिगत जाति और वातावरण के साथ उसके संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
2. सामुदायिक पारिस्थितिकी(Synecology)-इसके अंतर्गत स्थान विशेष में पाए जाने वाले समस्त पादप व जंतु समुदाय का अपने वातावरण के साथ संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
NOTE- 'जनसंख्या पारिस्थितिकी' 'समुदाय पारिस्थितिकी' और 'पारिस्थितिकी-तंत्र पारिस्थितिकी' सामुदायिक स्थिति के प्रमुख उप विभाग हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र - जीव मंडल के सभी सघटकों के समूह जो पारस्परिक क्रिया में सम्मिलित होते हैं, को पारिस्थितिकी तंत्र कहा जाता है ।
पारिस्थितिकी तंत्र शब्द का प्रयोग ए. जी. टैन्सले द्वारा 1935 में किया गया था ।
पृथ्वी स्वयं में एक विशाल पारिस्थितिकी तंत्र है जिसे जीवमंडल कहते हैं । जीवमंडल में निम्नांकित तीन प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र को शामिल किया जाता है
1.अलवणीय जल पारिस्थितिकी तंत्र
2.लवणीय जल पारिस्थितिकी तंत्र
3.स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र
पारिस्थितिकी तंत्र के घटक-प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र दो प्रकार के घटकों (1)जीवीय घटक और (2)अजीवीय घटक से मिलकर बनता है ।
जीवीय घटक-पारिस्थितिक तंत्र के जीवीय घटक में विभिन्न प्रकार के पादप एवं जंतु आते हैं, जो सभी आपस में एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
जीवीय घटक को दो वर्गों-स्वपोषित और परपोषित घटक में वर्गीकृत किया जाता है।
स्वपोषित या उत्पादक घटक में प्रकाश संश्लेषण तथा रासायनिक संश्लेषी जीवों को शामिल किया जाता है।
परपोषित घटक में उपभोक्ता और अपघटनकर्ता को शामिल किया जाता है ।
(1).उपभोक्ता घटक को निम्न तीन श्रेणियां में विभक्त किया जाता है
1.प्राथमिक उपभोक्ता-शाकाहारी जीव
2.द्वितीयक उपभोक्ता- यह सामान्यतः प्राथमिक उपभोक्ता से पोषण प्राप्त करते हैं ।
3.तृतीयक उपभोक्ता- यह द्वितीयक श्रेणी मांसाहारी उपभोक्ताओं पर निर्भर होते हैं। इस श्रेणी में कुछ उच्च उपभोक्ता यथा शेर ,चीता या बाज भी होते हैं जिन्हें अन्य कोई जीव मारकर नहीं खा सकते हैं ।
(2).अपघटनकर्ता घटक- श्रेणी के जीवों को सैपरोफेजेज भी कहा जाता है । यह उत्पादक व उपभोक्ता की मृत्यु के बाद उनके शरीर को अपघटित करते हैं इनमें मृतोपजीवी कवक, जीवाणु तथा एक्टीनोमाइटीसिज आदि शामिल है।
*-उत्पादक,उपभोक्ता तथा अपघटन करता को मिलाकर बायोमास कहा जाता है।
अजीवीय घटक-ओडम (1971)के अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र के अजैवीय घटकों को तीन भागों में बांटा जा सकता है।
1.अकार्बनिक: इसमें ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन,जल, मृदा , कार्बन, सल्फर, फास्फोरस आदि शामिल है ।
*-एक पारिस्थितिकी तंत्र में किसी भी समय एक कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को स्टैंडिंग स्टेज कहते हैं ।
2.कार्बनिक: इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा लिपिड्स आदि होते हैं । ये पारिस्थितिक तंत्र में अजैविक व जैविक घटकों में संबंध स्थापित करते हैं ।
*-अकार्बनिक और कार्बनिक भाग मिलकर निर्जीव वातावरण का निर्माण करते हैं ।
3.जलवायवीय या भौतिक : इसके अंतर्गत विभिन्न कारक यथा प्रकाश,ताप, वर्षा, आर्द्रता आदि ।भौतिक घटकों में सौर ऊर्जा मुख्य है, जो हरे पौधों के पर्णहरित द्वारा विकिरण ऊर्जा के रूप में ग्रहण की जाती है।
खाद्य श्रृंखला क्या है? :-
खाद्य श्रृंखला पारिस्थितिकी तंत्र से भोजन तथा ऊर्जा का प्रवाह एक जीव से दूसरे जीव में होता है, इस प्रवाह को ही खाद्य श्रृंखला कहा जाता हैं।
खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा में होता है। खाद्य श्रृंखला का निर्माण प्राथमिक उत्पादक (हरे पौधे), प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी उपभोक्ता एवं अपघटनकर्ता (कवक, जीवाणु) आपस में मिलकर करते हैं ।
खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक स्तर को ऊर्जा स्तर या ट्रापिक स्तर कहते हैं ।
खाद्य श्रृंखला के प्रकार- खाद्य श्रृंखलाएं तीन प्रकार की होती हैं ।
1.परभक्षी श्रृंखला: इसमें श्रृंखला पौधों से प्रारंभ होकर छोटे जंतुओं से क्रमशः बड़े जंतुओं की ओर जाती है ।
उदाहरण-✓✓. हरे पौधे (उत्पादक) ~शाकभाजी किट (प्राथमिक उपभोक्ता)~ मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) ~ सांप (तृतीयक उपभोक्ता) ~बाज (सर्वोच्च उपभोक्ता या उच्च मांसाहारी)
✓✓.हरे पौधे ~खरगोश ~कुत्ता ~भेड़िया~ शेर
2. परजीवी श्रृंखला: इसमें श्रृंखला पौधों से प्रारंभ होकर बड़े जीव से छोटे जीव की ओर जाती है उदाहरण-
✓✓ वृक्ष ~चिडियाएं~ सूक्ष्मजीव
3.मृतोपजीवि श्रृंखला : इसमें श्रृंखला मृत जीवों (पौधों या जन्तु) से होकर सूक्ष्मजीवों (कवक व जीवाणु) की तरफ जाती है इसमें मृत जीवों के कार्बनिक पदार्थो से सूक्ष्मजीव भोजन या ऊर्जा प्राप्त करते हैं तथा अंत में अपघटनकर्ता जीव का जाते हैं ।
उदाहरण -मृत कार्बनिक पदार्थ ~सफेद चींटी ~चींटी खाने वाले जीव
खाद्य जाल
क्या है खाद्य जाल? : किसी भी परिस्थितिकी तंत्र में अनेक खाद्य श्रृंखलाएं आपस में जुड़कर खाद्य जाल बनती हैं। जिसके द्वारा एक संपूर्ण समुदाय के सभी जीवित जीवों में अंतर्संबंध स्थापित होता है ।
'खाद्य जाल' में ऊर्जा तथा भोजन का प्रवाह एकदिशीय होते हुए भी भिन्न-भिन्न पथो से होकर गुजरता है तथा प्रत्येक ऊर्जा स्तर पर कुछ ऊर्जा नष्ट होती जाती है ।
'खाद्य जाल' में प्रत्येक उपभोक्ता के लिए एक से अधिक तरह के जीव उपभोग के लिए उपलब्ध रहते हैं इसलिए 'खाद्य जाल' में किसी एक जीव के नष्ट हो जाने पर भी इसकी स्थिरता पर प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि उसके स्थान की कमी को इस स्तर के अन्य जीव द्वारा पूरा कर दिया जाता है।
किसी परिस्थितिकी तंत्र में खाद्य जाल जितना जटिल और विशाल होता है, परिस्थितिकी तंत्र उतना ही स्थाई होता है।
परिस्थितिकीय पिरामिड
क्या है पारिस्थितिकी पिरामिड?: किसी भी परिस्थितिकी तंत्र में प्राथमिक उत्पादकों एवं विभिन्न श्रेणि के उपभोक्ताओं (प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं उत्तम श्रेणी) की संख्या, जीव भार और संचित ऊर्जा में परस्पर संबंध को जब चित्र रूप में दर्शाया जाता है तो उसे पारिस्थितिक पिरामिड कहा जाता है।
पारिस्थितिक पिरामिड के बारे में सर्वप्रथम ब्रिटेन की चार्ल्स एल्टन (1927) में बताया था
पारिस्थितिक पिरामिड मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं- जीवसंख्या पिरामिड, जीवभार पिरामिड तथा ऊर्जा पिरामिड
1. जीवसंख्या पिरामिड- इस पिरामिड में उत्पादक व उपभोक्ता स्तरों पर जीवों की संख्या का चित्रण प्रस्तुत किया जाता है।
सामान्य रूप से इस प्रकार का पिरामिड सीधा ही बनता है जिसमें उत्पादकों की संख्या सर्वाधिक होती है जबकि उच्चतम उपभोक्ता की संख्या सबसे कम होती है।
उदाहरण- वृक्षज् पारिस्थितिक तंत्र
अपवाद:- कुछ जीवसंख्या पिरामिड उल्टे बनते हैं उदाहरण- परजीवी खाद्य श्रृंखला (यह श्रृंखला बड़ी वृक्ष से शुरू होती है इस पर निर्भर रहने वाली चिड़िया की संख्या अधिक होती है तथा उन चिड़ियों पर पलने वाले परजीवियों की संख्या सर्वाधिक होती है।)
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| जीवसंख्या पिरामिड |
2. जीवभार पिरामिड -किसी परिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक कायिक स्तर पर संपूर्ण शुष्क भार को जीवभार कहा जाता है।
जीवभार के पिरामिड सीधे और उल्टे दोनों प्रकार के होते हैं उदाहरण के लिए वन एवं घास स्थल पारिस्थितिक तंत्र के जीवभार पिरामिड सीधे बनते हैं इसके विपरीत जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जीवभार पिरामिड प्रायः उल्टा बनता है। इसमें प्राथमिक उत्पादकों यथा फाइटोप्लेंकटोन, डायटम की संख्या अधिक होते हुए भी जीवभार अगले स्तरों के जीवभार सभी अगले स्तरों के जीवभार से कम होता है।
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| जीवभार पिरामिड |
3.ऊर्जा पिरामिड - प्रत्येक खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा एक ट्राफिक स्तर से दूसरे ट्राफिक स्तर पर जाने में कम हो जाती है।
✓ एक स्तर पर संचित ऊर्जा का केवल 10% भाग ही दूसरे स्तर की जीव के लिए स्थानांतरित होता है।
इस प्रकार उत्पादकों में ऊर्जा सर्वाधिक होती है जो खाद्य श्रृंखला के अगले स्तरों (उपभोक्ताओं) में क्रमशः कम होती जाती है।
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| ऊर्जा पिरामिड |
उपयुक्त कारण से किसी पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा बनता है।
'Quize'
Q ➤ प्रकृति को मेहतर (Scavengers) किसे कहा जाता है?
Q ➤ स्क्लेरोफाइट्स (Seterophytes) शब्द का प्रयोग किया जाता हैं?
Q ➤ दो पारिस्थितिकी तंत्रों के मध्य के संक्रमण क्षेत्र को कहते हैं?
Q ➤ 'दस प्रतिशत का नियम' देने वाले वैज्ञानिक थे?
Q ➤ अंतरिक्ष यान में बनाया गया पारितंत्र होता है?
Q ➤ उपभोक्ता तल पर ऊर्जा संचय कहलाता है?
Q ➤ पारितंत्र का गतिक हृदय कहलाता है?
Q ➤ प्रकृति में सर्प पादपों पर निर्भर कोटों को खाते हैं, यदि मोर सर्प को खाता है, तो मोर होगा-
Q ➤ प्रकाश संश्रेषण द्वारा ऊर्जा का कितना प्रतिशत भाग रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है?
Q ➤ झीलों और तालाबों में फास्फेट और नाइट्रेट गिरने से क्या होगा ?



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