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लोक देवता बाबा रामदेव जी का जीवन परिचय :-
1. सम्पूर्ण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में ' रामसा पीर' , 'रुणीचा रा रुणीचा रा धणी ',व बाबा रामदेव नाम से प्रसिद्ध लोकदेवता है।
प्रश्न:-बाबा रामदेव जी की जाति व वंशावली है?
उत्तर:- रामदेवजी का जन्म तॅवर वंशीय ठाकुर अजमाल जी के यहां हुआ।इनकी माता का नाम मैणादे थे। ये अर्जुन के वंशज माने जाते हैं ।
प्रश्न:-बाबा रामदेव के पिता का नाम था?
उत्तर:-अजमाल जी
प्रश्न:- रामदेव जी महाराज का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर:- रामदेव जी का जन्म भ्राद्रपद शुक्ला द्वितीया सं. 1462( सन् 1405) को बाड़मेर की शिव तहसील के उण्डु कासमेर गॉंव में हुआ था ।
प्रश्न:-रामदेव जी महाराज की मृत्यु कब हुई थी?
उत्तर:- भाद्रपद सुदी एकादशी सं.1515(सन् 1458) को इन्होंने रुणीचा के राम सरोवर के किनारे जीवित समाधि ली थी ।
2.रामदेव जी का जन्म कैसे हुआ?
राजा अजमल जी भैरव राक्षस को मारने का उपाय सोचते हुए द्वारका पहुंचे। जहां अजमल जी को भगवान के साक्षात दर्शन हुए, कहा, हे भक्तराज रो मत मैं तुम्हारा सारा दु:ख जानता हूँ। मैं तेरी भक्ती देखकर बहुत प्रसन्न हूँ, माँगो क्या चाहिये तुम्हें मैं तेरी हर इच्छायें पूर्ण करूँगा। हे प्रभु अगर आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मुझे आपके समान पुत्र चाहिये यानि आपको मेरे घर पुत्र बनकर आना पड़ेगा और राक्षस को मारकर धर्म की स्थापना करनी पड़ेगी। तब भगवान द्वारकानाथ ने कहा- हे भक्त! जाओ मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि पहले तेरे पुत्र विरमदेव होगा तब अजमल जी बोले हे भगवान एक पुत्र का क्या छोटा और क्या बड़ा तो भगवान ने कहा- दूसरा मैं स्वयं आपके घर आउंगा। अजमल जी बोले हे प्रभू आप मेरे घर आओगे तो हमें क्या मालूम पड़ेगा कि भगवान मेरे धर पधारे हैं, तो द्वारकानाथ ने कहा कि जिस रात मैं घर पर आउंगा उस रात आपके राज्य के जितने भी मंदिर है उसमें अपने आप घंटियां बजने लग जायेगी, महल में जो भी पानी होगा वह दूध में बदल जाएगा तथा मुख्य द्वार से जन्म स्थान तक कुमकुम के पैर नजर आयेंगे वह मेरी आकाशवाणी भी सुनाई देगी और में अवतार के नाम से प्रसिद्ध हो जाउँगा।
4 .हिन्दू इन्हें कृष्ण का अवतार मानकर तथा मुसलमान ' रामसा पीर' के रूप में इनकी पूजा करते हैं।
5. कामड़िया पंथ रामदेवजी से प्रारम्भ हुआ माना जाता है।
6. इनके गुरु का नाम बालीनाथ था । ऐसी मान्यता है कि रामदेवजी ने भैरव राक्षस का वध कर जनता को कष्ट से न मुक्ति दिलाई, पोकरण कस्बे को पुन: बसायां तथा रुणेचा में रामसरोवर का निर्माण करवाया ।
7. रामदेवरा (रुणीचा)में 'रामदेवजी का विशाल मंदिर है, जहाँ हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक विशाल मेला भरता है, जिसकी मुख्य विशेषता साम्प्रदायिक सदभाव है, क्योंकि यहाँ हिन्दू-मुस्लिम एवं अन्य धर्मों के लोग बड़ी मात्रा में आते हैं । इस मेले का दूसरा आकर्षण रामदेवजी की भक्ति में कामड़ जांति की स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला तेरहताली नृत्य है । इनके अन्य मंदिर जोधपुर के पश्चिम में मसूरिया पहाड़ी पर, बिरॉटिया ( अजमेर ) एवं सुरताखेड़ा ( चित्तौड़गढ़ ) में भी हैं।
8. रामदेवजी के प्रतीक चिन्ह के रूप में खुले चबूतरे पर ताख (आला) बनाकर उसमें संगमरमर या पीले पत्थर के इनके पगल्ये (चरण चिह्न) बनाकर गाँव-गाँव पूजे जाते हैं । इनके मेघवाल भक्त जनों:को 'रिखिया' कहते हैं । रामदेवजी के भक्त इन्हें कपड़े का बना घोड़ा चढ़ाते हैं ।
प्रश्न:- रामदेवजी के घोड़े का क्या नाम था?
उत्तर:- रामदेव जी का घोड़ा 'लीला' था.
9. भाद्रपद शुक्ला द्वितीया ' बाबे री बीज ' (दूज) के नाम से पुकारी जाती है तथा यही तिथि रामदेवजी के अवतार को तिथि के रूप में भी लोक प्रचलित है।
10. रामदेवजी के मंदिरो को ' देवरा ' कहा जाता है, जिन पर श्वेत या 5 रंगों की ध्वजा, ' नेजा ' फहराई जाती है।
11. रामदेवजी ही एक मात्र ऐसे देवता हैं, जो एक कवि भी थे। इनकी रचित 'चौबीस बाणियाँ' प्रसिद्ध हैं ।
12. रामदेवजी के नाम पर भाद्रपद द्वितिया व एकादशी को रात्रि जागरण किया जाता है, जिसे ' जम्मा ' कहते हैं ।
13. डालीबाई रामदेवजी की अनन्य भक्त थी, जिन्होंने रामदेव जी से एक दिन पूर्व उनके पास ही जीवित समाधि ले ली थी । वहीं डाली बाई का मंदिर है।
14. जिस विशिष्ट योगदान के लिए रामदेवजी की पूजा होती है वह है समाज को सभी जातियों और धर्मों के अनुयायियों के साथ समान व्यवहार । इन्होंने छुआछूत का बहिष्कार कर सबको अपनाया।
15. रामदेवजी की चूरमा मिठाई, दूध, नारियल और धूप आदि से पूजा होती है।
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