दामोदर लाल व्यास: राजस्थान के लौह पुरुष का जीवन, करियर और विरासत

दामोदर लाल व्यास, राजस्थान के प्रख्यात राजनेता, जिन्होंने राजस्व मंत्री और गृह मंत्री के रूप में सेवा दी। जानिए उनके प्रारंभिक जीवन, राजनीतिक करियर और
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दामोदर लाल व्यास
दामोदर लाल व्यास
दामोदर लाल व्यास

जन्म: 9 नवंबर 1909

मृत्यु: 14 जनवरी 1976

पद: राजस्व मंत्री, गृह मंत्री

प्रसिद्धि: राजस्थान का लौह पुरुष

जीवनसाथी: श्रीमती श्यामलता व्‍यास

प्रारंभिक जीवन

मालपुरा कस्बा, टोंक जिले में स्थित, मालदेव पंवार की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। यह वही स्थान है जहाँ कभी महाराणा प्रताप की सेना ने पड़ाव डाला था। इसी ऐतिहासिक स्थल पर 9 नवंबर 1909 को बृजलाल व्यास और कस्तूरबा व्यास के घर में दामोदर लाल व्यास का जन्म हुआ। उन्होंने राजस्थान की राजनीति में अपना विशेष स्थान बनाकर टोंक जिले के नाम को हमेशा के लिए रोशन कर दिया। दामोदर शुरू से ही प्रतिभाशाली थे, इसलिए उनकी शिक्षा-दीक्षा बी.ए./एल.एल.बी. तक हुई और उन्होंने वकालत करना शुरू कर दिया। व्यास डिग्गी ठिकाने के लिए वकालत करने की वजह से उनके काफी नजदीक रहे।

राजनीतिक करियर

उनका राजनीतिक जीवन स्वतंत्र भारत में हुए पहले चुनाव (1951) से ही शुरू हो गया था, जहाँ वे मालपुरा विधानसभा से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पहली बार जीते और राजस्थान के राजस्व मंत्री बने। 1957 के चुनाव में दोबारा भी उन्हें विजयश्री प्राप्त हुई और उन्हें चिकित्सा एवं स्वास्थ्य/देवस्थान विभाग मंत्री बनाया गया। हालांकि, व्यास 1962 का चुनाव सी. राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी के प्रत्याशी जयसिंह से हार गए, लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जयपुर राजघराने की महारानी गायत्री देवी को 15,000 वोटों से हराकर धमाकेदार वापसी की। बताया जाता है कि लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में गायत्री देवी को कांग्रेस में शामिल होने का न्यौता दिया था, लेकिन वे कांग्रेस की समाजवादी नीतियों से चिढ़ती थीं, इसलिए उन्होंने वह पेशकश ठुकरा दी। हालांकि, कांग्रेस ने उनके पति को स्पेन का राजदूत बना रखा था, फिर भी उनकी नाराजगी कांग्रेस से बनी रही। दरअसल, इंदिरा गांधी और गायत्री देवी के बीच छत्तीस का आंकड़ा था। 1967 में स्वतंत्र पार्टी ने राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत की अगुवाई वाली जनसंघ के साथ चुनाव लड़कर बहुमत हासिल किया, तो इंदिरा गांधी खिन्न हुईं। नतीजतन, इंदिरा गांधी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया। तब मजेदार किस्सा यह रहा कि गायत्री देवी लोकसभा का चुनाव तो जीत गईं, लेकिन विधानसभा का चुनाव मालपुरा सीट से कांग्रेस के दामोदर लाल व्यास से हार गईं। इसी तहलके की वजह से मोहन लाल सुखाड़िया मंत्रिमंडल में दामोदर व्यास को गृह मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। एक सख्त और अनुशासनप्रिय व्यक्ति के तौर पर व्यास ने गृह मंत्रालय को बखूबी संभाला। इसके बाद वे अस्वस्थ रहने लगे थे और 14 जनवरी 1976 को राजस्थान के इस लौह पुरुष को नियति के हाथों हारना पड़ा। दुनिया को अलविदा कहने से पहले ही वे अपना उत्तराधिकारी तैयार कर चुके थे, जो सुरेंद्र व्यास के रूप में अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कमर कस चुका था। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए सुरेंद्र व्यास ने 1972, 1980, 1990 और 1998 के मालपुरा विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीति में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा दिया है। मालपुरा की तरक्की में दामोदर लाल व्यास और सुरेंद्र व्यास के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। भले ही आजकल राजनीतिक समीकरण बदल चुके हों, लेकिन व्यास परिवार आज भी मालपुरा की बेहतरी और वहां की जनता की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है।

उपलब्धियां

  • राजस्थान के राजस्व मंत्री के रूप में कार्य किया।
  • गायत्री देवी को हराने वाले पहले नेता जो कि 1967 के विधानसभा चुनाव में व्यास जी ने जयपुर राजघराने की महारानी गायत्री देवी जी को 15,000 वोटो से हराया था

विरासत

उनकी नेतृत्व शैली और राजनीतिक दूरदर्शिता ने उन्हें राजस्थान का लौह पुरुष बना दिया।

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